
वैश्विक व्यापार और समुद्री कूटनीति के मोर्चे पर भारत ने एक ऐसा मास्टरस्ट्रोक खेला है, जिसने बीजिंग की रातों की नींद उड़ा दी है। भारत सरकार ने रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को हरी झंडी दे दी है। करीब 9 अरब अमेरिकी डॉलर (लगभग ₹75,000 करोड़ से अधिक) की लागत वाली यह मेगा परियोजना अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की सूरत बदलने के साथ-साथ हिंद महासागर में भारत को एक अजेय महाशक्ति के रूप में स्थापित करने जा रही है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रोजेक्ट भविष्य में चीन के लिए ‘मलक्का संकट’ को कई गुना बढ़ा देगा।
क्या है ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट?
166 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैले इस विशाल प्रोजेक्ट का मकसद सिर्फ एक बंदरगाह बनाना नहीं, बल्कि एक नया वैश्विक आर्थिक और सैन्य केंद्र खड़ा करना है। इसे पूरी तरह तैयार होने में लगभग तीन दशक (30 साल) का समय लगेगा, लेकिन इसका पहला चरण साल 2028 तक पूरा होने की उम्मीद है।
इस प्रोजेक्ट के 4 मुख्य स्तंभ:
इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (ICTT): गालाथिया खाड़ी (Galathea Bay) में गहरे पानी का एक अत्याधुनिक बंदरगाह।
नागरिक-सैन्य हवाई अड्डा: एक ऐसा रनवे जो वाणिज्यिक उड़ानों के साथ-साथ फाइटर जेट्स और सैन्य निगरानी विमानों के लिए भी काम आएगा।
गैस और सौर बिजली संयंत्र: परियोजना की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए एक आत्मनिर्भर पावर प्लांट।
आधुनिक टाउनशिप और पर्यटन: लगभग 3,50,000 लोगों के रहने के लिए एक स्मार्ट सिटी और वर्ल्ड-क्लास टूरिज्म इंफ्रास्ट्रक्चर।
चीन की सबसे कमजोर नस: ‘मलक्का जलडमरूमध्य’
चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जरूर है, लेकिन उसकी पूरी समृद्धि एक पतली सी समुद्री नली पर टिकी है, जिसे ‘मलक्का स्ट्रेट’ कहा जाता है। यह रास्ता दक्षिण चीन सागर को हिंद महासागर से जोड़ता है।
मलक्का स्ट्रेट और चीन का गणित आंकड़े और प्रभाव
वैश्विक व्यापार की हिस्सेदारी दुनिया के कुल समुद्री व्यापार का करीब 25% यहीं से गुजरता है।
वैश्विक तेल (Petroleum) का प्रवाह दुनिया के कुल कच्चे तेल के परिवहन का 30% हिस्सा।
चीन की निर्भरता चीन के कुल समुद्री व्यापार का दो-तिहाई और उसके तेल आयात का 70% से 80% हिस्सा इसी रास्ते से आता है।
बीजिंग लंबे समय से इस ‘चोकपॉइंट’ (अवरोधक बिंदु) से बचने के लिए सुंडा या लोम्बोक स्ट्रेट जैसे वैकल्पिक रास्ते ढूंढ रहा है, लेकिन वहां से जाने पर चीनी जहाजों को 1,800 किमी से 3,000 किमी तक की अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ती है। इससे ड्रैगन के लिए समय और कच्चे तेल की लागत बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। इसके अलावा चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) और म्यांमार पाइपलाइन भी मलक्का का पूर्ण विकल्प नहीं बन पाई हैं।
ग्रेट निकोबार: भारत का अभेद्य ‘प्रहरी’
ग्रेट निकोबार द्वीप की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यह थाईलैंड, मलेशिया और इंडोनेशिया के बेहद करीब है—यानी ठीक मलक्का स्ट्रेट के मुहाने पर। यहाँ भारतीय सेना और नौसेना की स्थायी मौजूदगी चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) की हर हरकत को लॉक कर देगी। “यह स्ट्रेट से आने-जाने वाले सभी ट्रैफिक पर नजर रखने के लिए एक बेहतरीन जगह है। इससे भारत को समुद्री क्षेत्र की जानकारी (मैरीटाइम डोमेन अवेयरनेस) के मामले में बहुत बड़ी बढ़त मिलेगी।” — शेखर सिन्हा, पूर्व वाइस चीफ, भारतीय नौसेना
सैन्य राजनयिक पूर्व ब्रिगेडियर संजय अय्यर का भी मानना है कि यह भारत द्वारा हाल के दशकों में खेला गया सबसे बड़ा रणनीतिक दांव है। उन्होंने साफ किया कि शांति के समय भारत किसी की नाकेबंदी नहीं करेगा, लेकिन युद्ध या टकराव की स्थिति में ग्रेट निकोबार पर मौजूद इंफ्रास्ट्रक्चर चीन के खिलाफ एक ऐसा ‘समुद्री अवरोध’ (Leverage) बनेगा, जो बिना एक भी गोली चलाए पूरे युद्ध का पासा पलट सकता है।
सिंगापुर और कोलंबो को टक्कर: भारत की आर्थिक चांदी
अभी तक भारत के पास इतने गहरे पानी वाले बंदरगाह (Deep Water Ports) नहीं थे, जहाँ दुनिया के सबसे बड़े कंटेनर जहाज लंगर डाल सकें। नतीजतन, भारतीय माल को पहले कोलंबो या सिंगापुर भेजा जाता था (जिसे ट्रांसशिपमेंट कहते हैं), जिससे भारत को भारी टैक्स और राजस्व का नुकसान होता था। गालाथिया खाड़ी में 14.2 मिलियन TEU क्षमता का इंटरनेशनल टर्मिनल बनने के बाद, भारत की विदेशी बंदरगाहों पर निर्भरता पूरी तरह खत्म हो जाएगी। अशोक यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर उदय चंद्र कहते हैं कि यह प्रोजेक्ट ‘द्वीपीय भारत’ (Insular India) के उदय का प्रतीक है। इसके जरिए भारत अपनी औपनिवेशिक भौगोलिक स्थिति की कमियों को दूर कर 21वीं सदी की समुद्री शक्ति बनने की ओर अग्रसर है।
पर्यावरण और विकास के बीच की कशमकश
हर बड़े प्रोजेक्ट की तरह इस परियोजना के सामने भी कुछ चुनौतियां हैं। आलोचकों और पर्यावरणविदों का कहना है कि इस निर्माण से ग्रेट निकोबार के घने जंगलों, वहां रहने वाली अर्ध-खानाबदोश शिकारी जनजाति ‘शोम्पेन’ और स्थानीय जैव विविधता को नुकसान पहुंच सकता है। हालांकि, सरकार द्वारा गठित पर्यावरण पैनल ने गहन जांच के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा और देश के आर्थिक भविष्य को सर्वोपरि रखते हुए इस प्रोजेक्ट को अंतिम मंजूरी दे दी है। निश्चित रूप से, ग्रेट निकोबार आने वाले समय में वैश्विक नौवहन (Shipping) का एक नया ‘होर्मुज’ बनने जा रहा है, जो व्यापार का रास्ता भी बदलेगा और भू-राजनीति का भूगोल भी।



